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उत्तराखंड

कलियर में “दुकान नम्बर-3” पर कब्जे का खेल! आदेश किसका, जिम्मेदार कौन..?

✍ Super Admin 🕒 14 May 2026, 09:24 PM
कलियर में “दुकान नम्बर-3” पर कब्जे का खेल! आदेश किसका, जिम्मेदार कौन..?

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पिरान कलियर: दरगाह दफ्तर एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला हज हाउस मार्ग स्थित नीलामी वाली दुकानों में से दुकान नम्बर-3 का है, जहां बिना स्पष्ट नीलामी प्रक्रिया और कथित तौर पर बिना सक्षम आदेश के नए व्यक्ति को कब्जा दिलाए जाने का आरोप लगा है। पूरे घटनाक्रम ने दरगाह संपत्तियों के प्रबंधन, अधिकारियों की कार्यशैली और सरकारी नियमों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार, मंगलवार को दरगाह दफ्तर में तैनात अकाउंटेंट सद्दाम हुसैन ने पुराने दुकानदार को फोन कर दुकान खाली करने के निर्देश दिए। दुकानदार ने कुछ समय मांगा, लेकिन उसे राहत नहीं मिली। आरोप है कि इसके कुछ ही देर बाद पीआरडी कर्मियों के साथ मौके पर पहुंचकर दुकान खाली कराई गई और दूसरे व्यक्ति का सामान दुकान में रखवाकर उसे कब्जा दिला दिया गया।

घटना के बाद पूरे क्षेत्र में चर्चाएं तेज हो गईं कि आखिर किस प्रक्रिया के तहत दुकान का कब्जा दूसरे व्यक्ति को दिया गया। क्योंकि न तो किसी सार्वजनिक नीलामी की जानकारी सामने आई और न ही किसी वैधानिक आवंटन प्रक्रिया का खुलासा हुआ।

मामले ने तब नया मोड़ ले लिया जब प्रबंधक/तहसीलदार विकास अवस्थी से इस संबंध में सवाल किया गया। तहसीलदार ने साफ कहा कि उन्होंने किसी व्यक्ति को दुकान पर कब्जा दिलाने का कोई आदेश नहीं दिया। उनके अनुसार, केवल बकाया किराया न जमा करने वाली दुकानों को नियमानुसार खाली कराने की बात कही गई थी। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी को बिना प्रक्रिया दुकान पर बैठाया गया है तो कब्जा हटाकर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

लेकिन तहसीलदार के इस बयान के बावजूद गुरुवार को कथित कब्जाधारी पूरे दिन दुकान नम्बर-3 पर मौजूद रहा। दुकान में नियाज-लंगर बनाने का कार्य भी चलता रहा, जबकि कार्रवाई या कब्जा हटाने को लेकर कोई हलचल नजर नहीं आई। इससे यह सवाल और गहरा गया कि यदि कब्जा वैध नहीं था तो फिर उसे जारी क्यों रहने दिया गया..?

स्थानीय लोगों और दरगाह से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक दुकान तक सीमित नहीं है, बल्कि दरगाह की संपत्तियों के संचालन और जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा है। आरोप है कि यदि बिना नीलामी और बिना लिखित आदेश के कब्जे दिलाए जाने लगे, तो सरकारी नियम और पारदर्शिता केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।
अब पूरे मामले में निगाहें प्रशासन और शासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। सवाल उठ रहा है कि मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami की जीरो टॉलरेंस नीति के बीच क्या इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच होगी..? क्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों से जवाब मांगा जाएगा..? या फिर मामला चर्चाओं तक सीमित रह जाएगा..?

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