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राष्ट्रवादी शायर पदम श्री डॉ. बशीर बद्र का निधन, साहित्य जगत में शोक की लहर

✍ Super Admin 🕒 30 May 2026, 06:02 PM
राष्ट्रवादी शायर पदम श्री डॉ. बशीर बद्र का निधन, साहित्य जगत में शोक की लहर

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रुड़की। उर्दू ग़ज़ल को विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाने वाले मशहूर राष्ट्रवादी शायर पदम श्री डॉ. बशीर बद्र का गत दिवस भोपाल में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से देश-विदेश के साहित्य प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है और हर ओर उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है।

डॉ. बशीर बद्र का उत्तराखंड के रुड़की, मंगलौर, कलियर, हरिद्वार और देहरादून से विशेष लगाव रहा। वे कई बार इन स्थानों पर मुशायरों और काव्य पाठ के लिए आए और अपनी शायरी से लोगों का दिल जीता। रुड़की से जुड़ी उनकी अनेक यादें आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।

उत्तराखंड उर्दू अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष एवं अंतरराष्ट्रीय शायर अफजल मंगलौरी ने बताया कि जब डॉ. बशीर बद्र मेरठ विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के अध्यक्ष थे, तब वे बीएम डिग्री कॉलेज रुड़की में बीए के छात्र थे। वे अंतर-विश्वविद्यालय प्रतियोगिताओं में भाग लेने मेरठ जाया करते थे, जहां डॉ. बशीर बद्र और डॉ. कुंवर बेचैन जैसे दिग्गज कवि जज के रूप में मौजूद रहते थे।

उन्होंने बताया कि 1987 में मेरठ के सांप्रदायिक दंगों में डॉ. बशीर बद्र का घर जला दिया गया था, जिससे वे बेहद आहत हुए। इस घटना पर उनकी कई ग़ज़लें मशहूर हुईं, जिनमें एक शेर आज भी लोगों की जुबान पर है:
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”
एक अन्य मशहूर शेर:
“बड़े शौक से मेरा घर जला, कोई आंच तुझ पर न आएगी,
ये जुबां किसी ने खरीद ली, ये कलम किसी के गुलाम है।”
इस घटना के बाद उन्होंने मेरठ छोड़ने का फैसला किया और भोपाल चले गए, जहां उन्होंने श्रीमती राहत बद्र से विवाह किया। बाद में वे वहीं बस गए।

अफजल मंगलौरी ने बताया कि 26 जून 1988 को उनके निमंत्रण पर डॉ. बशीर बद्र रुड़की आए, जहां नगर पालिका हॉल में “एक शाम – बशीर बद्र के नाम” कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस भव्य आयोजन में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एस.आई. जाफरी और तत्कालीन केंद्रीय पेट्रोलियम एवं गैस उपमंत्री रफीक आलम ने उन्हें “राष्ट्रीय एकता सम्मान” से सम्मानित किया।
रुड़की प्रवास के दौरान वे लगभग 10 दिनों तक यहां रहे और होटल पोलारिस के मैनेजर राजबहादुर सिंह से उनकी गहरी मित्रता हो गई। इस दौरान उन्होंने कलियर शरीफ, हरिद्वार और मंगलौर में कई कार्यक्रमों में भाग लिया।

मंगलौर में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री काजी मोहिउद्दीन के निवास पर भी वे ठहरे, जहां कई शानदार मुशायरे आयोजित हुए। इसके अलावा 1998 में बीएसएम डिग्री कॉलेज में आयोजित एक बड़े मुशायरे में भी उन्होंने भाग लिया।

डॉ. बशीर बद्र कई बार देहरादून, हरिद्वार, मंगलौर और रुड़की में काव्य पाठ के लिए आते रहे। वे सोलानीपुरम में पूर्व कुलपति प्रो. वहिदुदीन मलिक और जनसंपर्क अधिकारी मधुर जी के निवास पर भी कई बार ठहरे, जहां साहित्यिक महफिलें सजती रहीं।
अफजल मंगलौरी ने बताया कि वर्ष 2000 में कतर (दोहा) और दुबई में आयोजित “जश्न-ए-बशीर बद्र” कार्यक्रम में उन्होंने उत्तरांचल राज्य बनने पर उन्हें बधाई दी और विदेश आने का निमंत्रण भी दिया था।
उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि इतने बड़े साहित्यकार को उनके निधन पर अपेक्षित शासकीय सम्मान नहीं मिला। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि भोपाल जैसे शहर में सैकड़ों साहित्यकार होने के बावजूद उनकी अंतिम यात्रा में बहुत कम लोग शामिल हुए। बताया जाता है कि वे पिछले 10 वर्षों से कोमा की स्थिति में थे।
अफजल मंगलौरी ने कहा कि यह स्थिति समाज की संवेदनहीनता को दर्शाती है और एक महान शायर के प्रति यह व्यवहार बेहद दुखद है।

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