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धर्म

चांद दिखते ही होगी साबिर पाक के उर्स की पहली रस्म ‘मेंहदी डोरी’

✍ Javed Ansari 🕒 13 Aug 2026, 07:25 PM
चांद दिखते ही होगी साबिर पाक के उर्स की पहली रस्म ‘मेंहदी डोरी’

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पिरान कलियर। हजरत मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक रह. के सालाना उर्स/मेले का आगाज रबीउल अव्वल का चांद नजर आते ही उर्स की पहली और प्राचीन रस्म ‘मेंहदी डोरी’ के साथ होगा।

चांद दिखाई देने के बाद ईशा की नमाज के उपरांत सज्जादानशीन की ओर से यह ऐतिहासिक रस्म अदा की जाएगी। रस्म को लेकर कलियर में अकीदतमंदों में खासा उत्साह है और देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में जायरीनों के पहुंचने की उम्मीद है।


सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम
मेंहदी डोरी की प्राचीन रस्म सज्जादानशीन परिवार के कदीमी घर से शुरू होती है, जिसे वर्तमान में शाह नन्हे मियां साबरी कुद्दुसी मरहूम के मकान के नाम से जाना जाता है। सज्जादानशीन परिवार के सदस्य शाह खालिक मियां साबरी ने बताया कि यह परंपरा शाह अब्दुल रहीम साबरी कुद्दुसी के दौर से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि सदियों पुरानी इस परंपरा को आज भी उसी अकीदत, विश्वास और सम्मान के साथ निभाया जा रहा है।

रस्म से पहले फातिहा ख्वानी की जाती है। इसके बाद सज्जादानशीन, जायरीनों, सूफी संतों और बस्ती के लोगों के साथ कदीमी घर के लिए रवाना होते हैं। वहां फातिहा ख्वानी और हल्का होने के दौरान मेंहदी डोरी संदल को थाल में रखकर सिरों पर उठाया जाता है।
इसके बाद अदब और अकीदत के साथ इसे जुलूस की शक्ल में दरगाह शरीफ लाकर पेश किया जाता है।
दरगाह में पेश होने के बाद जायरीनों में बांटा जाता है तबर्रुक। दरगाह शरीफ में मेंहदी डोरी पेश किए जाने के बाद इसे तबर्रुक के तौर पर अकीदतमंदों और जायरीनों में तकसीम किया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में जायरीन मौजूद रहते हैं और पूरी रस्म रूहानी एवं अकीदत भरे माहौल में संपन्न होती है।
शाह खालिक मियां की ओर से किए जाते हैं इंतजाम
शाह खालिक मियां साबरी ने बताया कि मेंहदी डोरी की रस्म से जुड़े तमाम इंतजाम उनकी ओर से किए जाते हैं। उर्स की पहली रस्म होने के कारण इसे लेकर कलियर में तैयारियां तेज कर दी गई हैं। वहीं, जायरीनों के पहुंचने का सिलसिला भी शुरू हो गया है।
मेंहदी डोरी से शुरू होता है उर्स की रस्मों का सिलसिला
मेंहदी डोरी की रस्म के साथ ही साबिर पाक के सालाना उर्स की धार्मिक और रूहानी रस्मों का सिलसिला आगे बढ़ता है। इस ऐतिहासिक परंपरा में देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचने वाले अकीदतमंद शामिल होते हैं और दरगाह शरीफ पर अमन, खुशहाली, बरकत और आपसी भाईचारे की दुआएं मांगते हैं।

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